धोबी मां बेटा- 2

आप ने maa beta sex story के पिछले भाग धोबी मां बेटा- 1 में पढ़ा पर जब से मां के स्वाभाव में चेंज आया था नदी पर मेरी हालत ऐसे हो जाती थी की मैं मजबूर हो जाता था अब तो घर पर मैं जब भी स्त्री करने बैठता तो मुझे बोलती जाती देख ध्यान से स्त्री करियो अब आप maa beta sex story में आगे पढ़े

Dhobi Maa Beta Sex Story 2

पिछली बार शयामा बोल रही थी की उसके ब्लाउज ठीक से स्त्री नहीं थे मैं भी बोल पड़ता ठीक है कर दूंगा इतना छोटा सा ब्लाउज तो पहनती है ढंग से स्त्री भी नहीं हो पाती पता नहीं कैसे काम चलती है इतने छोटे से ब्लाउज में तो मां बोलती अरे उसकी चूचियां ज्यादा बड़ी थोड़े ही है जो वो बड़ा ब्लाउज पहनेगी

हां उसकी सास के ब्लाउज बहुत बड़े बड़े है बुढ़िया के मम्में पहाड़ जैसे है कह कर मां हंसने लगती फिर मेरे से बोलतीतू सबके ब्लाउज की लंबाई चौड़ाई देखता रहता है क्या या फिर स्त्री करता है मैं क्या बोलता चुपचाप सिर झुका कर स्त्री करते हुए धीरे से बोलता अरे देखता कौन है नज़र चली जाती है

बस स्त्री करते करते मेरा पूरा बदन पसीने से नहा जाता था मैं केवल लूंगी पहने स्त्री कर रहा होता था मां मुझे पसीने से नहाए हुए देख कर बोलती छोड़ अब तू कुछ आराम कर ले तब तक मैं स्त्री करती हूं

मां ये काम करने लगती थोड़ी ही देर में उसके माथे से भी पसीना चुने लगता और वो अपनी साड़ी खोल कर एक ओर फेक देती और बोलती बरी गर्मी है रे

पता नहीं तू कैसे कर लेता है इतने कपड़ो की स्त्री मेरे से तो ये गर्मी बर्दाश्त नहीं होती इस पर मैं वही पास बैठा उसके नंगे पेट गहरी नाभि और मोटे मम्मों को देखता हुआ बोलता ठंडा कर दूं तुझे?

कैसे करेगा ठंडा?

डंडे वाले पंखे से मैं तुझे पंखा झल देता हूं फैन चलाने पर तो स्त्री ही ठंडी पड़ जाएगी

रहने दे तेरे डंडे वाले पंखे से भी कुछ नहीं होने जाने का छोटा सा तो पंखा है तेरा कह कर अपने हाथ ऊपर उठा कर माथे पर छलक आए पसीने को पोछती तो मैं देखता की उसकी कांख पसीने से पूरी भीग गई है

मां की गर्देन से बहता हुआ पसीना उसके ब्लाउज के अंदर उसके दोनो मम्मों के बीच की घाटी मे जा कर उसके ब्लाउज को भींगा रहा होता

घर के अंदर वैसे भी वो ब्रा तो कभी पहनती नहीं थी इस कारण से उसके पतले ब्लाउज को पसीना पूरी तरह से भीगा देता था और उसके मम्में उसके ब्लाउज के ऊपर से नज़र आते थे कई बार जब वो हल्के रंगा का ब्लाउज पहनी होती तो उसके मोटे मोटे भूरे रंग के निपल नज़र आने लगते ये देख कर मेरा लंड खड़ा होने लगता था

कभी कभी वो स्त्री को एक तरफ रख के अपने पेटीकोट को उठा के पसीना पोछने के लिए अपने सिर तक ले जाती और मैं ऐसे ही मौके के इंतेज़ार में बैठा रहता था क्योंकि इस वक़्त उसकी आंखे तो पेटीकोट से ढक जाती थी

पर पेटीकोट ऊपर उठने के कारण उसका टांगे पूरा जांघ तक नंगी हो जाती थी और मैं बिना अपनी नज़रो को चुराए उसके गोरी चिटी मखमली जांघों को तो जी भर के देखता था

मां अपने चेहरे का पसीना अपनी आंखे बंद कर के पूरे आराम से पोछती थी और मुझे उसके मोटे कंडली के खम्भे जैसे जांघों को पूरा नज़ारा दिखाती थी रात में जब खाना खाने का टाइम आता तो मैं नहा धो कर किचन में आ जाता खाना खाने के लिए मां भी वही बैठा के मुझे गरम गरम रोटिया सेक देती जाती और हम खाते रहते

इस समय भी वो पेटीकोट और ब्लाउज में ही होती थी क्यों की किचन में गर्मी होती थी और उसने एक छोटा सा पल्लू अपने कंधो पर डाल रखा होता उसी से अपने माथे का पसीना पोछती रहती और खाना खिलती जाती थी मुझे हम दोनो साथ में बाते भी कर रहे होते

मैंने मज़ाक करते हुए बोलता सच में मां तुम तो गरम स्त्री हो वो पहले तो कुछ समझ नहीं पाती फिर जब उसकी समझ में आता की मैं आइरन स्त्री ना कह के उसे स्त्री कह रहा हूं तो वो हसने लगती और कहती हां मैं गरम स्त्री हूं और अपना चेहरा आगे करके बोलती देख कितना पसीना आ रहा है मेरी गर्मी दूर कर दे

मैं तुझे एक बात बोलू तू गरम चीज़े मत खाया कर ठंडी चीज़ खाया कर

अच्छा कौन से ठंडी चीज़ मैं खाऊं कि मेरी गर्मी दूर हो जाएगी

केले और बैगन की सब्जिया खाया कर

इस पर मां का चेहरा लाल हो जाता था और वो सिर झुका लेती और

धीरे से बोलती अरे केले और बैगान की सब्जी तो मुझे भी अच्छी लगती है पर कोई लाने वाला भी तो हो तेरा बापू तो ये सब्जिया लाने से रहा ना तो उसे केला पसंद है ना ही उसे बैगन

तू फिकर मत कर मैं ला दूंगा तेरे लिए

अच्छा बेटा है तू मां का कितना ध्यान रखता है

मैं खाना ख़तम करते हुए बोलता चल अब खाना तो हो गया ख़तम तू भी जा के नहा ले और खाना खा ले अरे नहीं अभी तो तेरा बापू देसी चढ़ा के आता होगा उसको खिला दूंगी तब खाऊंगी तब तक नहा लेती हूं तू जा और जा के सो जा कल नदी पर भी जाना है

मुझे भी ध्यान आ गया की हां कल तो नदी पर भी जाना है मैं छत पर चला गया गर्मियों में हम तीनो लोग छत पर ही सोया करते थे

सुबह सूरज की पहली किरण के साथ जब मेरी नींद खुली तो देखा एक तरफ बापू अभी भी लुढ़का हुआ है और मां शायद पहले ही उठ कर जा चुकी थी मैं भी जल्दी से नीचे पहुचा तो देखा की मां बाथरूम से आ के हैंडपंप पर अपने हाथ पैर धो रही थी

मुझे देखते ही बोली चल जल्दी से तैयार हो जा मैं खाना बना लेती हूं फिर जल्दी से नदी पर निकाल जायेंगे तेरे बापू को भी आज शहर जाना है बीज लाने मैं उसको भी उठा देती हूं थोरी देर में जब मैं वापस आया तो देखा की बापू भी उठ चुका था और वो बाथरूम जाने की तैयारी में था

मैं भी अपने काम में लग गया और सारे कपड़ों के गट्ठर बना के तैयार कर दिया थोड़ी देर में हम सब लोग तैयार हो गये घर को ताला लगाने के बाद बापू बस पकड़ने के लिए चल दिया

हम दोनो नदी की ओर मैंने मां से पुछा की बापू कब तक आयेंगे तो वो बोली क्या पता कब आएगा मुझे तो बोला है की कल आ जाउंगा पर कोई भरोसा है तेरे बापू का चार दिन भी लगा देगा

हम लोग नदी पर पहुच गये और फिर अपने काम में लग गये कपड़ों की सफाई के बाद मैंने उन्हें एक तरफ सूखने के लिए डाल दिया और फिर हम दोनो ने नहाने की तैयारी शुरू कर दी

मां ने भी अपनी साड़ी उतार के पहले उसको साफ किया फिर हर बार की तरह अपने पेटीकोट को ऊपर चढ़ा के अपनी ब्लाउज निकाली फिर उसको साफ किया और फिर अपने बदन को रगड़ रगड़ के नहाने लगी

मैं भी बगल में बैठा उसको निहारते हुए नहाता रहा बेखयाली में एक दो बार तो मेरी लूंगी भी मेरे बदन पर से हट गई थी पर अब तो ये बहुत बार हो चुका था इसलिए मैंने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया हर बार की तरह मां ने भी अपने हाथो को पेटीकोट के अंदर डाल के खूब रगड़ रगड़ के नहाना चालू रखा

थोड़ी देर बाद मैं नदी में उतर गया मां ने भी नदी में उतर के एक दो डुबकिया लगाई और फिर हम दोनो बाहर आ गये मैंने अपने कपडे चेंज कर लिए और पाजामा और कुर्ता पहन लिया मां ने भी पहले अपने बदन को टॉवेल से सूखाया फिर अपने पेटीकोट के डोर को जिसको की वो छाती पर बांध के रखती थी ऊपर से खोल लिया और अपने दांतों से पेटीकोट को पकड़ लिया

ये उसका हमेशा का काम था मैं उसको पत्थर पर बैठ के एक तक देखे जा रहा था इस प्रकार उसके दोनो हाथ फ्री हो गये थे अब उसने ब्लाउज को पहन ने के लिए पहले उसने अपना बाया हाथ उसमे घुसाया

फिर जैसे ही वो अपना दाहिना हाथ ब्लाउज में घुसाने जा रही थी की पता नहीं क्या हुआ उसके दांतों से उसकी पेटीकोट छुट गई और सीधे सरसरते हुए नीचे गिर गई और उसका पूरा का पूरा नंगा बदन एक पल के लिए मेरी आंखों के सामने दिखने लगा

उसके बड़े बड़े मम्में जिन्हे मैंने अब तक कपड़ों के ऊपर से ही देखा था और उसके भारी बाहरी चूतड़ और उसकी मोटी मोटी जांघे और झाट के बाल सब एक पल के लिए मेरी आंखों के सामने नंगे हो गये पेटीकोट के नीचे गिरते ही उसके साथ ही मां भी तेज़ी के साथ नीचे बैठ गई मैं आंखे फाड़ फाड़ फर के देखते हुए वही पर खड़ा रह गया

मां नीचे बैठ कर अपने पेटीकोट को फिर से समेटती हुई बोली ध्यान ही नहीं रहा मैं तुझे कुछ बोलना चाहती थी और ये पेटीकोट दांतों से छुट गया मैं कुछ नहीं बोला

मां फिर से खडी हो गई और अपने ब्लाउज को पहनने लगी फिर उसने अपने पेटीकोट को नीचे किया और बांध लिया फिर साड़ी पहन कर वो वही बैठ के अपने भीगे पेटीकोट को साफ कर के तैयार हो गई

फिर हम दोनो खाना खाने लगे खाना खाने के बाद हम वही पेड़ की छावं में बैठ कर आराम करने लगे जगह सुनसान थी ठंडी हवा बह रही थी मैं पेड़ के नीचे लेटे हुए मां की तरफ घुमा तो वो भी मेरी तरफ घूमी इस वक़्त उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कराहट पसरी हुई थी

मैंने पुछा मां क्यों हंस रही हो

तो वो बोली क्या करू अब हसने पर भी कोई रोक है क्या?

नहीं मैं तो ऐसे ही पूछ रहा था नहीं बताना है तो मत बताओ

मां बोली- अरे इतनी अच्छी ठंडी हवा बह रही है चेहरे पर तो मुस्कान आएगी ही यहा पेड़ की छांव में कितना अच्छा लग रहा है ठंडी ठंडी हवा चल रही है और आज तो मैंने पूरा हवा खाया है

पूरा हवा खाया है वो कैसे

मैं पूरी नंगी जो हो गई थी फिर बोली ही तुझे मुझे ऐसे नहीं देखना चाहिए था

क्यों नहीं देखना चाहिए था

अरे बेवकूफ़ इतना भी नहीं समझता एक मां को उसके बेटे के सामने नंगा नहीं होना चाहिए था

कहा नंगी हुई थी तुम बस एक सेकेंड के लिए तो तुम्हारा पेटीकोट नीचे गिर गया था हालांकि वही एक सेकेंड मुझे एक घंटे के बराबर लग रहा था

हा फिर भी मुझे नंगा नहीं होना चाहिए था कोई जानेगा तो क्या कहेगा की मैं अपने बेटे के सामने नंगी हो गयी थी

कौन जानेगा यहा पर तो कोई था भी नहीं तू बेकार में क्यों परेशान हो रही है

अरे नहीं फिर भी कोई जान गया तो फिर कुछ सोचती हुई बोली अगर कोई नहीं जानेगा तो क्या तू मुझे नंगा देखेगा क्या मैं और मां दोनो एक दूसरे के आमने सामने एक सूखे चादर पर सुन सान जगह पर पेड़ के नीचे एक दूसरे की ओर मुंह कर के लेते हुए थे और मां की साड़ी उसकी छाति पर से लुढ़क गई थी

मां के मुंह से ये बात सुन के मैं खामोश रह गया और मेरी सांसे तेज चलने लगी मां ने मेरी ओर देखते हुए पुछा क्या हुआ मैंने कोई जवाब नहीं दिया और हल्के से मुस्कुराते हुए उसकी छातियो की तरफ देखने लगा जो उसकी तेज चलती सांसो के साथ ऊपर नीचे हो रहे थे

वो मेरी तरफ देखते हुए बोली क्या हुआ मेरी बात का जवाब दे ना अगर कोई जानेगा नहीं तो क्या तू मुझे नंगा देख लेगा? इस पर मेरे मुंह से कुछ नहीं निकला और मैंने अपना सिर नीचे कर लिया मां ने मेरी ठोड़ी पकड़ के ऊपर उठाते हुए मेरे आंखों में झांकते हुए पुछा क्या हुआ रे? बोल ना क्या तू मुझे नंगा देख लेगा जैसे तूने आज देखा है

मैंने कहा मां मैं क्या बोलू मेरा तो गला सुख रहा था

मां ने मेरे हाथ को अपने हाथो में ले लिया और कहा इसका मतलब तू मुझे नंगा नहीं देख सकता है ना

मेरे मुंह से निकाल गया- मां छोड़ो ना मैं हकलाते हुए बोला नहीं मां ऐसा नहीं है

तो फिर क्या है तू अपनी मां को नंगा देख लेगा क्या

मैं क्या कर सकता था वो तो तुम्हारा पेटीकोट नीचे गिर गया

तभी मुझे नंगा दिख गया नहीं तो मैं कैसे देख पाता

वो तो मैं समझ गई पर उस वक़्त तुझे देख के मुझे ऐसा लगा जैसे की तू मुझे घूर रहा है इसी लिये पुछा

मां ऐसा नहीं है मैंने तुम्हे बताया ना तुम्हे बस ऐसा लगा होगा

इसका मतलब तुझे अच्छा नहीं लगा था ना

मां छोड़ो मैं हाथ छुड़ाते हुए अपने चेहरे को छूपाते हुए बोला

मां ने मेरा हाथ नहीं छोड़ा और बोली सच सच बोल शरमाता क्यों है

मेरे मुंह से निकाल गया हां अच्छा लगा था

इस पर मां ने मेरे हाथ को पकड़ के सीधे अपनी छाती पर रख दिया और बोली फिर से देखेगा मां को नंगा बोल देखेगा?

मेरी मुंह से आवाज़ नहीं निकाल पा रहा था मैंने बड़ी मुश्किल से अपने अपने हाथो को उसके नुकीले गुदज छातियों पर स्थिर रख पा रहा था ऐसे में मैं भला क्या जवाब देता? मेरे मुंह से एक क्रहने की सी आवाज़ निकली मां ने मेरी ठोडी पकड़ कर फिर से मेरे मुंह को ऊपर उठाया और बोली क्या हुआ बोल ना शरमाता क्यों है जो बोलना है बोल

मैं कुछ ना बोला

थोड़ी देर तक उसके मम्मों पर ब्लाउज के ऊपर से ही हल्का सा मैंने हाथ फेरा फिर मैंने हाथ खीच लिया मां कुछ नहीं बोली गौर से मुझे देखती रही फिर पता ना क्या सोच कर वो बोली ठीक मैं सोती हूं यही पर बड़ी अच्छी हवा चल रही है तू कपड़ों को देखते रहना और जो सुख जाए उन्हे उठा लेना ठीक है और फिर मां मुंह घुमा कर एक तरफ सो गई

मैं भी चुप चाप वही आंख खोले लेटा रहा मां के मम्में धीरे धीरे ऊपर नीचे हो रहे थे उसने अपना एक हाथ मोड़ कर अपने आंखों पर रखा हुआ था और दूसरा हाथ अपने बगल में रख कर सो रही थी मैं चुपचाप उसे सोता हुआ देखता रहा थोड़ी देर में उसके ऊपर नीचे होते मम्मों का जादू मेरे ऊपर चल गया और मेरा लंड खड़ा होने लगा

मेरा दिल कर रहा था की काश मैं फिर से उन मम्मों को एक बार छू लू मैंने अपने आप को गालियां भी निकाली क्या उल्लू का पट्ठा हूं मैं भी जो चीज़ आराम से छूने को मिल रही थी तो उसे छूने की बजाए मैं हाथ हटा लिया पर अब क्या हो सकता था मैं चुप चाप वैसे ही बैठा रहा कुछ सोच भी नहीं पा रहा था

बाकी कहानी maa beta sex story के अगले भाग धोबी मां बेटा- 3 में पढ़े